समीक्षा
तुलसी और मानस के प्रकाश को जन -जन तक पहुंचाता ग्रंथ: हिंदुत्व के दिव्य प्रकाश तुलसी और मानस
समीक्षक-
पं. हरि दत्त चतुर्वेदी 'हरीश'
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पुस्तक का नाम- हिंदुत्व के दिव्य प्रकाश तुलसी और मानस संपादक - आचार्य नीरज शास्त्री
प्रकाशक- एक्सप्रेस पब्लिशिंग नंबर- 8,3-क्रास स्ट्रीट, तमिलनाडु 600004( मद्रास)
प्रथम संस्करण -2023
पृष्ठ - 106 मूल्य - 200/-
ISBN 000,000049178-3
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राष्ट्रीय गौरव के लेखक एवं राष्ट्रवादी चिंतक आचार्य नीरज शास्त्री के द्वारा संपादित कृति 'हिंदुत्व के दिव्य प्रकाश तुलसी और मानस' मुझे अवलोकनार्थ एवं समीक्षार्थ प्राप्त हुई ।मैंने इस कृति को कई बार पढ़ा और मनन किया, तब यह समीक्षा लिख रहा हूं।यह पुस्तक हिंदू संस्कृति के पोषक- संरक्षक व संवाहक तथा हिंदुत्व के गौरवशाली महाकाव्य रामचरितमानस के रचयिता एवं हिंदू समाज के पथ प्रदर्शक संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी को समर्पित है। इस पुस्तक में क्रमशः 16 साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार आलेख रूप में प्रस्तुत किए हैं। सभी लेखकों के भावपूर्ण उद्गार संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी और उनके द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के प्रति उनकी श्रद्धा एवं आत्मीय स्नेह की झांकी प्रस्तुत करते हैं , जो सहज दृष्टिगोचर है। स्वतंत्र लेखक जयप्रकाश पचौरी ने पावन ग्रंथ रामचरितमानस में प्रकृति का मनोहारी वर्णन किया है। लेखक ने बताया है कि यह पावन ग्रंथ मानव के पापों का हरण करने वाला व कलयुग की वैतरणी को पार कराने वाला है जो पूर्ण रूपेण सत्य है। कविवर राम सिंह 'साद' एवं डॉ. धर्मपाल 'साहिल' ने गोस्वामी तुलसीदास एवं संत कबीर के साहित्य में समता मूलक विवेचना की है। विद्वान लेखकों ने स्पष्ट किया है कि दोनों संतों का संपूर्ण जीवन संघर्ष में ही गुजरा। दोनों का जीवनचक्र समान रूप से कष्ट सहन करने वाला रहा फिर भी दोनों ही संत आध्यात्म की सगुण एवं निर्गुण शाखा के उन्नायक रहे । संत शिरोमणि कबीरदास निर्गुण शाखा के ध्वजवाहक हैं तथा गोस्वामी तुलसीदास निर्गुण एवं सगुण दोनों शाखाओं के अनुयाई एवं समन्वयक हैं। इतना ही नहीं वे सभी जाति एवं संप्रदायों के भी समन्वयकारी हैं। इस तरह वे हिन्दू समाज के पोषक और मार्गदर्शन रहे ।
डॉ. नीतू गोस्वामी बताती हैं कि तुलसी अपनी समन्वय साधना के कारण अपने युग के लोकनायक थे। उनमें वह प्रगतिशीलता विद्यमान थी जिसमें परिस्थितियों के अनुकूल नवीन दृष्टिकोण अपनाकर नव संस्कार स्थापित करने की क्षमता थी। उनके अनुसार गोस्वामी जी ने स्वयं कहा है कि यश, कविता और वैभव वही श्रेष्ठ है, जिससे गंगा के समान सबका कल्याण हो।
राष्ट्रीय चिंतन के साहित्यकार आचार्य नीरज शास्त्री एवं डॉ. धर्मेंद्र कुमार अग्रवाल ने तुलसी द्वारा नारी सम्मान के बारे में अपने-अपने मत प्रकट किए हैं। दोनों ही लेखकों के विचार अति उत्तम, तर्कपूर्ण एवं तथ्यपूर्ण हैं ।तुलसीकृत महाकाव्य रामचरितमानस की एक चौपाई को आधार बनाकर तुलसी को नारी विरोधी के रूप में विधर्मियों एवं अधर्मियों ने आरोपित किया और जो बवंडर उन्होंने खड़ा किया, उसके द्वारा लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास को कटघरे में खड़ा कर दिया गया, जबकि यह पूर्णतः अनुचित है। यह सब कोमल हृदय ,समाजोद्धारक संत तुलसीदास की छवि और कीर्ति को धूमिल करने के लिए ही किया गया। कुछ हिंदुत्व के विरोधियों ने संत शिरोमणि तुलसीदास को नारी विरोधी के साथ ही हिंदू समाज का पथभ्रष्ट्रक भी कहा जो अत्यंत तथ्यहीन और पूर्णत: अनुचित प्रलाप है । वह चौपाई जिसके माध्यम से परम संत तुलसी के सम्मान पर आक्षेप करते हुए नारी की गरिमा के हनन का प्रश्न उठाया गया, वह है- "ढोर, गंवार- शूद्र ,पशु -नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।" यहां 'ताड़ना' शब्द को लेकर बवाल मचा जबकि 'ताड़ना' शब्द अनेकार्थी है ।'ताड़ना' अवधी भाषा का शब्द है, इसके कई अर्थ होते हैं, जैसे- देखना, समझना और ध्यान रखना आदि।
" ढोर गंवार- शूद्र,पशु -नारी।" में उस नारी की बात की जा रही है जो झगड़ालू और क्लेशकारी रही हैं । यहां नारी के अमर्यादित रूप की ओर इंगित किया जा रहा है, और यह सत्य है कि ऐसी नारी और उसकी हरकतों को ताड़ना आवश्यक होता है। यह बात पूरी तरह सही है, इन्हें गंभीरता से देखा जाना चाहिए और समझना चाहिए जिससे कि किसी भी तरह की कोई समस्या उत्पन्न न हो।
हिंदुत्व के चिंतक आचार्य नीरज शास्त्री ने संत शिरोमणि तुलसीदास को हिंदू समाज का पथदर्शक एवं हिंदू समाज का उद्धारक मानकर विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब दिया है। वह कहते हैं कि तुलसी उस बात के लिए जिम्मेदार हैं जो उन्होंने कही है, उसके लिए नहीं जो लोग समझते हैं। तुलसी ने कभी भी नारी के सम्मान को हानि पहुंचाने का प्रयास नहीं किया। वे तो नारी सम्मान के पोषक और प्रवर्तक हैं किंतु जो लोग तुलसी के ऊपर इस तरह के घिनौने आरोप लगाते हैं उन्होंने निश्चित ही उस प्रसंग को ध्यान से नहीं पढ़ा है और वे मानस के मर्म को नहीं समझ पाए है ।संत शिरोमणि तुलसीदास भक्ति काल के सगुण शाखा के महाकवि थे। वे सभी हिंदू देवी- देवताओं का आदर- सत्कार और पूजन करना उचित मानते थे। उनका मत था कि व्यक्ति सभी के प्रति श्रद्धा भाव रखें। यह गुण तुलसीदास जी में अतिशय विद्यमान था। इसीलिए गोस्वामी जी का अपने इष्ट ,गुरु, देव, गौ और स्त्री के प्रति श्रद्धा- भाव था। अतः उनकी यह श्रद्धा, भक्ति और प्रेम मानस में सर्वत्र परिलक्षित होता है । उनका अपने गुरु और इष्ट के प्रति हृदय से समर्पण का भाव अनुपम है। एक उदाहरण में मिलता है कि जब गोस्वामी जी व्रज में आए और उन्होंने श्री कृष्ण की छवि के दर्शन किए तो कहा कि प्रभु आप देखने में बहुत ही मनोहरी लगते हो किंतु मेरा मस्तक तो तब झुकेगा जबकि आपके हाथों में धनुष- बाण हों। आश्चर्यजनक बात यह है कि उस समय भगवान कृष्ण की छवि के हाथों में धनुष- बाण आ गए जिसे ब्रजवासियों ने देखा और यह प्रसंग अमर हो गया। तुलसीदास जी ने कहा था -
" कहा कहूं छवि आपकी, भले बने हो नाथ।
तुलसी मस्तक तब झुके , धनुष बाण लेओ हाथ।।
उनके इतना कहते ही प्रभु ने श्री राम के रूप में अपने दर्शन दिए।
इस प्रकार पुस्तक में सम्मिलित सभी लेखकों के उत्कृष्ट विचारों का मैं सम्मान करते हुए उनका हृदय से धन्यवाद देता हूं और आशा करता हूं कि वे इसी प्रकार रामचरितमानस और तुलसीदास जी का प्रचार- प्रसार करते हुए हिंदुत्व को गौरव प्रदान करते रहेंगे।
मैं कविश्रेष्ठ साहित्यविद् आचार्य नीरज शास्त्री का आभारी हूं ,जिन्होंने अन्य लेखकों के लेखों को संकलित कर हिंदू हृदय सम्राट, श्री राम भक्त और हिंदुत्व के दिव्य प्रकाश संत शिरोमणि तुलसीदास जी और उनके महाकाव्य रामचरितमानस के आदर्शों को जन- जन तक पहुंचाने का प्रयास किया है तथा सभी को उनकी महानता से अवगत कराया है । पुस्तक का आवरण पृष्ठ अति सुंदर एवं मनोहारी है। पुस्तक की पृष्ठ संख्या 106 है और पुस्तक का मूल्य ₹200 रुपये मात्र है जो उचित है ।भविष्य में यह पुस्तक हिंदू समाज का पथ दर्शन करेगी उद्धार करेगी और विधर्मियों का मान मर्दन करेगी।
भगवान श्री राम से प्रार्थना है कि वह अपने भक्तों और हिंदुत्व के उन्नयन की कामना रखने वाले सभी हिंदू रत्नों की मनोकामनाएं पूर्ण करें और उनको सभी प्रकार के सुख, शांति व भक्ति आदि आनंद प्रदान करें।
इस हेतु मैं एक छंद निवेदित करना चाहता हूं-
भरपेट मिलै भोजन सबकूं ,
अरु नीर मिलै हैं प्यास बुझावन ।
तनु ढकबे कूं नव वस्त्र मिलें ,
अरु गेह मिलै सुख -रैन बितावन।
जग मांहि मिलै सम्मान सबै,
तनु चैन मिलै मन राम बसावन ।
लोचन अभिराम 'हरीश' मिलें,
रसनाऊ मिलै तुलसीकृत गावन।।
शुभकामनाओं के साथ- पं. हरि दत्त चतुर्वेदी 'हरीश' संरक्षक- श्याम कला मंडल
मनसा देवी मंदिर
लाजपत नगर, मथुरा 281004
मो.7017046915