BREAKING NEWS
 Mail to a Friend Rate      

महायोगी गोरखनाथ का हिंदी काव्य पर प्रभाव तथा योगदान

Fri, Feb 16th 2024 / 08:09:21 धर्म-आस्था
महायोगी गोरखनाथ का हिंदी काव्य पर प्रभाव तथा योगदान

 डॉ.राजेंद्र खटाटे (काशी में विद्याश्री न्यास द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय संगोष्ठि में उद्भोधन)


  शिव और बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की विस्तृत दार्शनिक तथा तांत्रिक साधना और पतंजली और वसिष्ठ के योग से निराला हठयोग या गुरू परंपरा का महत्व स्थापित करनेवाले,भाषा में सधुकड्डी का उपयोग करके ज्ञान और योग के बल पर सामान्य जन को साधना से बलवान योगी बनानेवाले या हठयोग को जन आंदोलन में स्थापित करनेवाले महायोगी गोरखनाथ को हम किस तरह से यांद करते है या हमारे इतिहास की स्मृतियों में गोरखनाथ कोहिनूर हिरे जैसे चमकते है.......गोरखनाथ का व्यक्तित्व-कृतित्व-साहित्य ऐसे ही एक युग को परिभाषित तथा महिमान्वित करता हैं।

 

      गोरखनाथ भारत की आध्यात्मिक और साहित्यिक लोकाकाश के ऐसे एकमात्र सितारें है जिसका चरित्र और कार्य किवदन्तियों में खोय़ा हुआ है।उन किवदन्तियों में गोरखनाथ को खोज़ना या समझना कठिन ही नहीं होता परंतु उनके पुरुषार्थ को समझना भी एक मिथक बन जाता है।इसलिए उनके साहित्य की तरफ दृष्टिक्षेप करके उनके चरित्र को समझना पड़ता है।गोरखनाथ का जन्म ऐसी स्थितियों में हुआ हैं शैवमत में उनके पूर्ववर्ती शंकर थे,शाक्तमत में कौलमार्गी मत्सेंद्रनाथ थे,वज्रयानी तिबेतियन बौद्ध मत था,योग में पतंजली और वसिष्ठ थे ,गोरख ने सामान्य लोगों में योग की भावना को जाग्रत किया था जिसे हठयोग कहा जाता है जो पतंजलि के अष्टांग योग से अपने आप में अलग थी जिसमें यम-नियम को हटाकर षष्टांग योग में परिणत किया।इसी दरम्यान इस्लामिक सूफी धारा भी बहने लगी थी और फिर गोरख और शंकर के बाद रामानुज के प्रभाव में भक्ति आंदोलन की या संत परंपरा खड़ी हो गयी जो हठयोग के विरोध में और शंकर मत को पराजित करके आगे बह गई।

      भारत की ज्ञान परंपरा तथा धर्म,आध्यात्म के इतिहास में गोरखनाथ संधिकाल के ऐसे शिखर पुरूष है जो हठयोग की एक नई परंपरा विकसित करते है और दूसरी ओर भक्तियोग आंदोलन की भी नींव रखते चले जाते है।हठयोग का प्रभाव करीब पाचसौ साल और भक्तियोग का सातसौ साल ऐसे करीब बारासौ साल तक भारत के मानस पर राज़ किया है।भारत की शैव ,शाक्त और तिबेतियन बुद्धिझम को साथ मिलाकर योग और तंत्र को स्थापित किया।साधना के क्षेत्र में जिसने पहली बार गुरू को शिष्य बनाया जो परंपरा तिबेट में मुख्य रूप से दिखती है मारपा जो मिलारेपा के गुरु थे वे बाद में मिलारेपा के शिष्य बन जाते है।गुरू परंपरा को नाथों द्वारा स्थापित की गई हैं।गुरू को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।गुरु गोरखनाथ के द्वारा हम भारत का इतिहास,अध्यात्म,धर्म,साहित्य को समझ सकते है। 

 

नाथ संप्रदाय में आदिनाथ या श्रीनाथ शिव को प्रथम नाथ के रूप में स्वीकार किया जाता है।  शाबर तंत्र में भी कापालिकों के बाराह आचार्यों में आदिनाथ का नाम प्रथम हैं। शाक्त मार्ग भी तंत्रानुसारी है जिसके उपदेष्टा नाथ ही है अर्थात तंत्र की रचना नाथों ने ही की हैं। षोड़षतंत्र में शिव ने कहा है की मेरे कहे तंत्र को नवनाथों ने ही प्रचारीत किया है।

गोरखनाथ के गुरु मत्सेद्रनाथ थे जिन्हें भारत में शिव का अवतार तो नेपाल में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर का अवतार माना जाता है।अवलोकितेश्वर एक बोधिसत्व थे जिन्हें शिव के नाम से भी जाना जाता है ( बुद्ध की करूणा का प्रतीक ) । मत्सेंद्रनाथ को भारत में शिव का अवतार,नेपाल में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर का अवतार और शाक्त मार्गी कौल मार्ग में प्रथम आचार्य माना है और नवनाथों में आदि गुरु। 

 

नाथ संप्रदाय या परंपरा जिसे हम गुरु परंपरा से भी परिभाषित कर सकते है । इस परंपरा को नौ नाथ जिसमें मत्सेंद्रनाथ,गोरखनाथ,जालंदर,कानिफ,चर्पटी,नागनाथ,भर्तहरी,रेवन,गहिनी और चौ-यांसी सिद्ध से पहचाना जाता है जिसकी सूची तिब्तत में वज्रयानियों के पास हैं।

 

 

गोरखनाथ का हठयोग - 

 

   प्राचीन ग्रंथो में हठयोग को प्राण-निरोध प्रधान साधना कहते है तो पतंजली योग को चित्तवृत्ति - निरोध प्रधान साधना कहते है। 'सिद्ध सिद्धांत पद्धति ' में 'ह' का अर्थ सूर्य और 'ठ' का अर्थ चंद्र है जिसे सूर्य - चंद्र योग भी कहा जाता है जिसका विवेचन कुण्डलिनि योग में इडा - पिंगला नाड़ी को शुद्ध करके कुंड़ली जो मूलाधार में स्थित है उसे सुषूम्ना नाड़ी से प्रवाहित कर सहस्रार चक्र तक लेकर जाता है चेतना को समाधि में स्थिर किया जाता है।

  हठयोग की जो प्राचीन जानकारी वज्रयानियों का ग्रंथ ' अमृतसिद्धि ' में मिलती है। जिसकी रचना तिब्बती भाषा में ११६० में की गई थी।हिन्दू ग्रंथो में १२ वी शताब्दी की है जिससे यह प्रतीत होता है की जो वज्रयानियों से ली गयी हो।

हठयोग, जिसे हठप्रधान योग भी कहा जाता है, एक प्राचीन योग पथ है जो भारतीय साहित्य और दर्शन की परंपरा में स्थित है। इसका इतिहास वेदों, उपनिषदों, और तांत्रिक साहित्य में मिलता है। हठयोग का सर्वप्रथम उल्लेख हाथयोगप्रदीपिका, गोरक्षशतक, और शिवसम्हिता जैसे ग्रंथों में है। इसमें आसन, प्राणायाम, मुद्राएं, और ध्यान की अभ्यासशैली शामिल है।हठयोग, जिसे हठप्रधान योग भी कहा जाता है, एक योग पथ है जो शारीरिक और मानसिक शुद्धि एवं साधना के माध्यम से आत्मा का साक्षात्कार करने का उद्देश्य रखता है। हठयोग की व्याख्या विभिन्न योगिओं और ग्रंथों में मिलती है।

समान समाचार